वेद पुराणों में हमने देखा
काल के हर खंडो में देखा
तेरी हर शक्ति का उल्लेख
तुझ में ही सृष्टि बसी
सृष्टि में ही तुम बसी
फिर भी नारी तू क्यों हारी
जब भी विपदा पड़ी जग में
अनेकों रूप करे हैं धारण
सृष्टि पर से दानवों का
किया है पल में खातमा
फिर भी नारी तू क्यों हारी
काल के हर खंड में है
तेरा इतिहास स्वर्णिम
दुष्टों के लिये दुर्गा बनी
भक्तों के लिये पार्वती
फिर भी नारी तू क्यों हारी
हर युग की तेरी कहानी है
तू त्रेता की सीता की जैसे
तू द्वापर की राधा की जैसे
तू कलयुग की मीरां की जैसे
फिर भी नारी तू क्यों हारी
जब संकट आया भारत पर
तू मरदाना वेश पहन कर
बन झांसी की रानी तूने
तलवार खूब चलायी है
नारी फिर भी तू क्यों हारी
तू प्रेम स्नेह करुणा की सागर
शक्ति भक्ति और ममता की गागर
सिमटे है तुझमे कितने ही गम
तू हर गम को हर बार संवारती
फिर भी नारी तू क्यों हारी
खुद का सम्मान बचाने को
अपना अस्तित्व बचाने को
हर बार तू खुद से लड़ती है
शर्म आँखों मे ले दृढ़ता से खड़ी
फिर भी नारी तू क्यों हारी
ये कैसा संसार तूने बनाया है
विडम्बना देखो इस संसार की
पुरुष जो तुमसे ही जन्मा
हुकुम तुम पर ही चला रहा
फिर भी नारी तू क्यों हारी
तू भावुक तू कोमल है
पर तू कमजोर नही है
तू अबला तू नादान नही
हर काम से तेरी पहचान है
फिर भी नारी तू क्यों हारी
दिखावा करने को हम तैयार है
नारी को मान सम्मान देने
वर्ष में केवल एक दिन हम
महिला दिवस मनाते हैं
कहता मऊ का साँवरा
सम्मान नारी को देना है
बंदिशों जुल्मों से आज़ाद करो
वो स्वयं अपनी अधिकारी हो
हे नारी तू बड़ी बलशाली
फिर भी नारी तू क्यों हारी
🖋️साँवर कुमावत 'मऊ'🖋️
काल के हर खंडो में देखा
तेरी हर शक्ति का उल्लेख
तुझ में ही सृष्टि बसी
सृष्टि में ही तुम बसी
फिर भी नारी तू क्यों हारी
जब भी विपदा पड़ी जग में
अनेकों रूप करे हैं धारण
सृष्टि पर से दानवों का
किया है पल में खातमा
फिर भी नारी तू क्यों हारी
काल के हर खंड में है
तेरा इतिहास स्वर्णिम
दुष्टों के लिये दुर्गा बनी
भक्तों के लिये पार्वती
फिर भी नारी तू क्यों हारी
हर युग की तेरी कहानी है
तू त्रेता की सीता की जैसे
तू द्वापर की राधा की जैसे
तू कलयुग की मीरां की जैसे
फिर भी नारी तू क्यों हारी
जब संकट आया भारत पर
तू मरदाना वेश पहन कर
बन झांसी की रानी तूने
तलवार खूब चलायी है
नारी फिर भी तू क्यों हारी
तू प्रेम स्नेह करुणा की सागर
शक्ति भक्ति और ममता की गागर
सिमटे है तुझमे कितने ही गम
तू हर गम को हर बार संवारती
फिर भी नारी तू क्यों हारी
खुद का सम्मान बचाने को
अपना अस्तित्व बचाने को
हर बार तू खुद से लड़ती है
शर्म आँखों मे ले दृढ़ता से खड़ी
फिर भी नारी तू क्यों हारी
ये कैसा संसार तूने बनाया है
विडम्बना देखो इस संसार की
पुरुष जो तुमसे ही जन्मा
हुकुम तुम पर ही चला रहा
फिर भी नारी तू क्यों हारी
तू भावुक तू कोमल है
पर तू कमजोर नही है
तू अबला तू नादान नही
हर काम से तेरी पहचान है
फिर भी नारी तू क्यों हारी
दिखावा करने को हम तैयार है
नारी को मान सम्मान देने
वर्ष में केवल एक दिन हम
महिला दिवस मनाते हैं
कहता मऊ का साँवरा
सम्मान नारी को देना है
बंदिशों जुल्मों से आज़ाद करो
वो स्वयं अपनी अधिकारी हो
हे नारी तू बड़ी बलशाली
फिर भी नारी तू क्यों हारी
🖋️साँवर कुमावत 'मऊ'🖋️
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