मन में है बसी, बस चाह यही
कि नाम तुम्हारा उच्चारा करूँ
बिठाके तुम्हे मन मंदिर में
मनमोहनी रूप निहारा करूँ
भर के पात्र में प्रेम का जल
पद पंकज नाथ पखारा करुँ
बन प्रेम पुजारी तुम्हारा प्रभु
नित आरती भव्य उतारा करूँ
तुम अयोग्य जानकर बिसराओ मुझे
पर में ना तुम्हे कभी बिसराया करूँ
🖋️साँवर कुमावत 'मऊ'🖋️

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